शनि देव की टेढ़ी नजर से बचने के लिए जरूर करें ये खास उपाय!

शनि देव की टेढ़ी नजर से बचने के लिए जरूर करें ये खास उपाय!

सभी देवी-देवताओं में शनिदेव न्याय के देवता कहलाता है। माना जाता है कि वे हर किसी को उनके कर्मों के हिसाब से फल प्रदान करते हैं। वे अच्छे कर्म करने वाले पर अपनी असीम कृपा बरसाते हैं। वहीं बुरे कर्म करने वाले को दंड देते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, शनिदेव के दिन यानि शनिवार के लिए कुछ उपाय करने से कुंडली में शनि की स्थिति मजबूत होती है। ऐसे में शनि महाराज की असीम कृपा पाने के लिए आज हम आपको कुछ उपाय बताते हैं...

- इस दिन काली गाय को उड़द दाल खिलाना, तेल या तिल खिलाने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

- न्याय के देवता शनिदेव की पूजा हमेशा सूर्य निकलने से पहले या सूर्यास्त के बाद होती है। इसलिए शनिवार के दिन सूर्योदय से पहले या बाद में पीपल के वृक्ष की पूजा करें। इसके लिए सरसों के तेल में लोहे के कील डालकर पीपल पेड़ पर अर्पित करें। मान्यता है कि इससे शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

- शनिदेव की कृपा पाने के लिए सरसों तेल से शनि महाराज की मूर्ति पर तेल अर्पित करें। यह उपाय शनिवार के दिन से शुरू करके करीब 43 दिनों तक करें। मगर रविवार को ऐसा करने से बचें।

- घर के मंदिर में शनिवार के दिन शनि यंत्र स्थापित करें। साथ ही रोजाना यंत्र के आगे सरसों तेल का दीपक जलाकर विधि-विधान से पूजा करें। मान्यता है कि इससे शनिदेव प्रसन्न होते हैं। इससे कुंडली में शनि की स्थिति मजबूत होती है।

- इस दिन कच्चा सूत का धागा लेकर पीपल पेड़ के चारों तरफ बांधे। साथ ही शनि मंत्रों का जप करें। कहा जाता है कि इससे शनिदेव जी असीम कृपा मिलती है।

- हो सके तो शनिदेव की कृपा पाने के लिए शनिवार को उपवास रखें। इसके अलावा इस दिन दान करने से भी कुंडली में शनि की स्थिति शांत होती है।

- मान्यता है कि शनिवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करने से शनिदेव की असीम कृपा मिलती है। साथ ही कुंडली में शनिदोष व साढ़े साती का प्रभाव कम होता है।

- शनिदेव न्याय के देवता कहलाने वाले हैं। वे गरीबों, बेसहारों व जरूरतमंदों की मदद करने वाले पर अपनी असीम कृपा बरसाते हैं। इसलिए कुंडली में शनि की स्थिति मजबूत करने के लिए इस किसी गरीब, जरूरतमंद, बेसहारा को खाना खिलाएं या दवा दिलाएं।


हर स्त्री को करनी चाहिए इतनी बार शादी, तभी पूरा होता है उनका जीवन

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आप की शादी से पहले से दुल्हन का स्वामित्व 3 लोगों को सौंपा जाता है। विवाह के समय जब पंडित आपको विवाह का मंत्र पढ़ा रहा होता है तब आप मंत्र का मतलब नहीं समझते हैं। असल में वैदिक परंपरा में नियम है कि स्त्री अपनी इच्छा से चार लोगों को पति बना सकती है। इस नियम को बनाए रखते हुए स्त्री को पतिव्रत की मर्यादा में रखने के लिए विवाह के समय ही स्त्री का संकेतिक विवाह तीन देवताओं से करा दिया जाता है।

4 पतियों से होती है स्त्री की शादी:

इसमें सबसे पहले किसी भी दूल्हन (कन्या) का पहला अधिकार चन्द्रमा को सौंपा जाता है, इसके बाद विश्वावसु नाम के गंधर्व को और तीसरे नंबर पर अग्नि को और अंत में उसके पति को सौंपा जाता है। 

इसी ही वैदिक परंपरा के कारण ही द्रौपदी एक से अधिक पतियों के साथ रही थी। और फिर अंत में आपको दुल्हन का हाथ सोप जाता है।